क्यूँ रहे इसी उम्मीद में जिंदा
कि कल की सुबह सुहानी होगी
आज उसे लाने की खातिर
क्यूँ ना मर कर देखा जाये
सर्द हो गये ज़ेहन सारे
बाकी नहीं बचा इनमें कुछ
क्यूँ ना थोडा गर्म लहू में
आज नहा कर देखा जाए
हद से हद इतना ही होगा
पंख जलेंगे देह झुलसेगी
कितनी आग है सूरज में
पास से जाकर देखा जाये
हर्फ हैं टेड़े ,नुक्ते गायब
छोडो सही- गलत की परवाह
झूठे कातिब से बेहतर है
खुद ही सच को लिक्खा जाये
कि कल की सुबह सुहानी होगी
आज उसे लाने की खातिर
क्यूँ ना मर कर देखा जाये
सर्द हो गये ज़ेहन सारे
बाकी नहीं बचा इनमें कुछ
क्यूँ ना थोडा गर्म लहू में
आज नहा कर देखा जाए
हद से हद इतना ही होगा
पंख जलेंगे देह झुलसेगी
कितनी आग है सूरज में
पास से जाकर देखा जाये
हर्फ हैं टेड़े ,नुक्ते गायब
छोडो सही- गलत की परवाह
झूठे कातिब से बेहतर है
खुद ही सच को लिक्खा जाये
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