Sunday, May 19, 2013

क्यूँ रहे इसी उम्मीद में जिंदा 
कि कल की सुबह सुहानी होगी 
आज उसे लाने की खातिर 
क्यूँ ना मर कर देखा जाये 

सर्द हो गये ज़ेहन सारे
बाकी नहीं बचा इनमें कुछ
क्यूँ ना थोडा गर्म लहू में 
आज नहा कर देखा जाए 

हद से हद इतना ही होगा 
पंख जलेंगे देह झुलसेगी 
कितनी आग है सूरज में
पास से जाकर देखा जाये 

हर्फ हैं टेड़े ,नुक्ते गायब 
छोडो सही- गलत की परवाह
झूठे कातिब से बेहतर है 
खुद ही सच को लिक्खा जाये 

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