हाथ मैं ज्यूँ प्रेमिका के हाथ सा ,
बस्तियों की गली से
चौक के फिर ऐन ऊपर
और शहर की सब से ऊँची छत्त से,
एक छिछोरे पेड को था ताकता,
जहाँ गया ये चाँद मेरे साथ था,
बाजार में होर्डिंग्स के पीछे से उतरा
रेलवे की पटरियों पे बेघरों सा भागता ,
जहाँ गया मैं
चाँद मेरे साथ था,
बारिशों की दलदली सी कीच से निकल के
चांदनी की चादरों में
बादलों पे पांव अपने छापता
जहाँ गया ये चाँद मेरे साथ था
हाथ में ज्यूँ प्रेमिका के हाथ सा