Sunday, April 21, 2013

दिन रात


धूप सीढ़ी उतरते उतरते जवान हो जाती है, फिर पूरे आँगन में एक भरी-पूरी औरत की तरह फ़ैल जाती है,शाम होने पर एक कोने में एक बूढी औरत के जैसी सिमट कर बैठ जाती है जहाँ से अँधेरा उसे उठा के ले जाता है .मैं उसे अपनी खिडकी से उसके साथ उठकर जाते देखता हूँ. पूरा दिन आसपास के आने वाले राहगीरों के शोर से बजबजाता है और फिर चुपचाप शाम के नाम से गलियों के नुक्कडों पर जमा होते शराबियों सा एक जगह इकट्ठा  हो कर वहीँ ढेर हो जाता है.

रात .... रात टिमटिमाती रोशनी से शुरू होती है और एक एक करके खिड़कियों, दरवाजों पर एक एक रोशनी का नुक्ता टांकती सी पूरे नक्श को सितारों से भर देती है किसी मेहनती कसीदाकार की तरह. मेरे आस पास भी हज़ारों चमकीले तारे थिरकने लगते हैं .धीरे धीरे ये दृश्य धुंधलाने लगता है और सितारे एक एक करके चिटख कर बुझने लगते हैं और एक एक करके सारे  बुझ जाते हैं और उनकी खाली होती जगह पर रोशनी की नाम का एक खाली धब्बा सा रह जाता है. पूरी रात की स्याही सारे आलम को अपनी नमी से गीला कर देती है,एक अजीब सा सन्नाटा उसमें सांय सांय बजने लगता है. रास्तों पे बिख्ररा कूड़ा और उसके लिए खींचतान करते कुत्ते सड़क की बदहवासी को और बढ़ा देते हैं.मैं खिडकी बंद करके बिस्तर पर आ जाता हूँ

शोर अब बाहर से अंदर आ जाता है. तख़्त पर रखी चादर मेरे हाथों से कई बार छूट जाती है.मेरे बैठते ही तखत कसमसाने लगता है और आवाज के साथ एक बोझ से दब जाता है.तकिया दीवार और तख़्त के बीच की लकीर पर चिपक जाता है. मैं बिना शोर किये तखत के एक कोने में एक सीधी लकीर के जैसा लेट जाता हूँ,कई बार उस लकीर ज़र्क आता है और फिर सीधी हो जाती है. इसी दौरान नींद मेरे सिरहाने बैठ कर मेरे कन्धों ,छाती ,पेट जाँघों और पाँव के अँगूठों के पोरों को सहलाने लगती है और मैं... रात और दिन के किसी फासले पर ढेर हो जाता हूँ   

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