उन दुखों का चिटठा जो रहन हैं मेरे माजी के पास और उन सुखों की किताबत जो मेरे वजूद से पैदा हुए हैं
Sunday, March 24, 2013
Tuesday, May 22, 2012
???
राह बदल गयी मेरे मुल्क की
हवा बदल गयी मेरे मुल्क की ........
अब लहू रगों में सर्द हो गया
बाजुओ का जोर खत्म हो गया
हर तरफ बाजार का सा शोर है
आदमी का भाव कमजोर है
नींद टूटती नहीं है खल्क की..........
राह बदल गयी मेरे मुल्क की
दिल दिमाग इश्क के बुखार में
देह का जुलुस है जवानियाँ
सुन के भी खून खौलता नहीं
जुल्म की बेंइन्तहा कहानियां
नीयतें खराब शाहे तख्त की ...
हवा बदल गयी मेरे मुल्क की ........
अब लहू रगों में सर्द हो गया
बाजुओ का जोर खत्म हो गया
हर तरफ बाजार का सा शोर है
आदमी का भाव कमजोर है
नींद टूटती नहीं है खल्क की..........
राह बदल गयी मेरे मुल्क की
दिल दिमाग इश्क के बुखार में
देह का जुलुस है जवानियाँ
सुन के भी खून खौलता नहीं
जुल्म की बेंइन्तहा कहानियां
नीयतें खराब शाहे तख्त की ...
Sunday, May 20, 2012
एक लंबी चुप्पी के बाद !
एक लंबी चुप्पी के बाद ...
कितना अच्छा लगता है बोलना
जैसे दोपहर भर उमस के बाद शाम की बारिश ,
या लंबी सर्द रात के बाद गुनगुनी धूप
कभी महसूस करना
किसी के न होने के बाद
उसके होने का अहसास ......
कितना अच्छा लगता है बोलना
जैसे दोपहर भर उमस के बाद शाम की बारिश ,
या लंबी सर्द रात के बाद गुनगुनी धूप
कभी महसूस करना
किसी के न होने के बाद
उसके होने का अहसास ......
Monday, April 30, 2012
जब तय था...
तय था तो क्यूँ रखा मुझे प्रथम पंक्ति में
जब हाशिए पे लाना था तो ?
अगर तुम चाहते थे तो क्यूँ
आगे रखा मुझे सिर्फ दरी उठाने को
मेरी आवाज़ सुनाई नहीं देती मुझे अब
इतना चीखा मैं तुम्हारे लिए....
जब हाशिए पे लाना था तो ?
अगर तुम चाहते थे तो क्यूँ
आगे रखा मुझे सिर्फ दरी उठाने को
मेरी आवाज़ सुनाई नहीं देती मुझे अब
इतना चीखा मैं तुम्हारे लिए....
Monday, March 12, 2012
मौन क्यूँ हो?
मौन क्यूँ हो?
जाओ इतिहास जगाओ
चल रहे हो
चाक से
तुम निरंतर
किन्तु बन्ध्या स्त्री सी गति क्यूँ है तुम्हारी
गति में तुम सृजन लाओ
खेत के किनारे खड़े पेड़ से तुम
मौन क्यूँ हो?
जाओ इतिहास जगाओ
चल रहे हो
चाक से
तुम निरंतर
किन्तु बन्ध्या स्त्री सी गति क्यूँ है तुम्हारी
गति में तुम सृजन लाओ
खेत के किनारे खड़े पेड़ से तुम
मौन क्यूँ हो?
मौन क्यूँ हो?
मौन क्यूँ हो?
जाओ इतिहास जगाओ
चल रहे हो
चाक से
तुम निरंतर
किन्तु बन्ध्या स्त्री सी गति क्यूँ है तुम्हारी
गति में तुम सृजन लाओ
खेत के किनारे खड़े पेड़ से तुम
मौन क्यूँ हो?
जाओ इतिहास जगाओ
चल रहे हो
चाक से
तुम निरंतर
किन्तु बन्ध्या स्त्री सी गति क्यूँ है तुम्हारी
गति में तुम सृजन लाओ
खेत के किनारे खड़े पेड़ से तुम
मौन क्यूँ हो?
Friday, February 24, 2012
Wednesday, February 22, 2012
हारा नहीं हूँ मैं
थका हूँ, अशांत हूँ,
हारा नहीं हूँ मैं॥
युद्ध में रत हूँ
हारा नहीं हूँ मैं
सूर्य के अवसान पे उदित हो
जो,भोर का तारा नहीं हूँ मैं
रोको अभी कुछ क्षण बाँध लूँ कटिबन्ध
शेष हूँ अभी
ये सारा नहीं हूँ मैं ...
हारा नहीं हूँ मैं
हारा नहीं हूँ मैं
हारा नहीं हूँ मैं॥
युद्ध में रत हूँ
हारा नहीं हूँ मैं
सूर्य के अवसान पे उदित हो
जो,भोर का तारा नहीं हूँ मैं
रोको अभी कुछ क्षण बाँध लूँ कटिबन्ध
शेष हूँ अभी
ये सारा नहीं हूँ मैं ...
हारा नहीं हूँ मैं
हारा नहीं हूँ मैं
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