Friday, February 2, 2024

" मैं हूँ एक जागरूक मतदाता"

 मेरी ऊँगली पर  पड़ा निशान
मुझे कई दिनों तक
 याद दिलाएगा कि
 मैं एक लोकतंत्र का नागरिक हूँ
जब भी आर टी ओ का बाबू
 ड्राइविंग लायसंस के लिए
 मांगेगा रूपया, मैं उसको दिखा के कहूँगा कि
 नहीं दूंगा क्यूँ कि " मैं हूँ एक जागरूक मतदाता"
 मैं दिया है वोट ,
भले ही न मिले मुझे
 मेरा लायसेंस.
जब भी नाटक  करने
 के  लिए इजाजत लेने के लिए
 मुझे लगाने  पड़ेगे थाने के चक्कर या
 डालना पड़ेगा किसी पत्रकार  की ठोड़ी में हाथ 
नहीं  डालूँगा
 क्यूँ कि " मैं हूँ एक जागरूक मतदाता"
 मैं दिया है वोट,
पासपोर्ट बनवाने के लिए रुपये देने की मजबूरी के बाद
 भी  काटने  पड़ेंगे चक्कर कोतवाली के..
 तो नहीं काटूँगा
क्यूँ कि " मैं हूँ एक जागरूक मतदाता"
 मैं दिया है वोट , मैं
 एक लोकतंत्र का नागरिक हूँ

Sunday, May 19, 2013

क्यूँ रहे इसी उम्मीद में जिंदा 
कि कल की सुबह सुहानी होगी 
आज उसे लाने की खातिर 
क्यूँ ना मर कर देखा जाये 

सर्द हो गये ज़ेहन सारे
बाकी नहीं बचा इनमें कुछ
क्यूँ ना थोडा गर्म लहू में 
आज नहा कर देखा जाए 

हद से हद इतना ही होगा 
पंख जलेंगे देह झुलसेगी 
कितनी आग है सूरज में
पास से जाकर देखा जाये 

हर्फ हैं टेड़े ,नुक्ते गायब 
छोडो सही- गलत की परवाह
झूठे कातिब से बेहतर है 
खुद ही सच को लिक्खा जाये 

Friday, April 26, 2013

चाँद और मैं



जहाँ गया मैं  चाँद मेरे साथ  था,
हाथ मैं ज्यूँ प्रेमिका के हाथ सा ,

बस्तियों की गली से
चौक के फिर ऐन ऊपर 
और शहर की  सब से ऊँची छत्त से,
एक छिछोरे पेड को था ताकता,  
जहाँ गया ये  चाँद मेरे साथ था,

बाजार में  होर्डिंग्स  के पीछे से उतरा
रेलवे की पटरियों पे बेघरों सा भागता ,
 जहाँ गया मैं 
 चाँद मेरे साथ था,

बारिशों की दलदली सी  कीच से निकल के 
 चांदनी की चादरों  में
बादलों पे पांव अपने छापता 
जहाँ गया ये चाँद मेरे साथ था 
हाथ में ज्यूँ प्रेमिका के हाथ सा 





 

Sunday, April 21, 2013


ये किस वक्त में हैं हम.
ना यहाँ नायक ही हैं कोई
ना यहाँ कोई मसीहा
ना कोई रास्ता बचा है हमारे लिए
ना कोई मंजिल अनछुई
ये किस वक्त में हम ?
साथी हैं मेरे जो
मुझसे आगे हैं 
जो पीछे है
उनसे मैं बात नहीं करता
पता नहीं कौन कहाँ है
ये किस वक्त में हैं हम?
अंधा सूरज
फेंक रहा है काली धूप
हवा गला घोंटती है मेरा
ये किस वक्त मैं हैं हम?
हर एक रास्ता
दोराहे पे जाकर क्यूँ खुलता है?
हर एक मील के पत्थर पर क्यूँ
लिखा है शून्य!
ये किस वक्त में है हम?

ना कोई खुदी  है ना खुदा परस्त
फिर भी कुछ लोग खुद को
खुदा मानते है
ये किस वक्त में में हम?
मेरे दोस्त !
ये किस वक्त में हैं हम?

दिन रात


धूप सीढ़ी उतरते उतरते जवान हो जाती है, फिर पूरे आँगन में एक भरी-पूरी औरत की तरह फ़ैल जाती है,शाम होने पर एक कोने में एक बूढी औरत के जैसी सिमट कर बैठ जाती है जहाँ से अँधेरा उसे उठा के ले जाता है .मैं उसे अपनी खिडकी से उसके साथ उठकर जाते देखता हूँ. पूरा दिन आसपास के आने वाले राहगीरों के शोर से बजबजाता है और फिर चुपचाप शाम के नाम से गलियों के नुक्कडों पर जमा होते शराबियों सा एक जगह इकट्ठा  हो कर वहीँ ढेर हो जाता है.

रात .... रात टिमटिमाती रोशनी से शुरू होती है और एक एक करके खिड़कियों, दरवाजों पर एक एक रोशनी का नुक्ता टांकती सी पूरे नक्श को सितारों से भर देती है किसी मेहनती कसीदाकार की तरह. मेरे आस पास भी हज़ारों चमकीले तारे थिरकने लगते हैं .धीरे धीरे ये दृश्य धुंधलाने लगता है और सितारे एक एक करके चिटख कर बुझने लगते हैं और एक एक करके सारे  बुझ जाते हैं और उनकी खाली होती जगह पर रोशनी की नाम का एक खाली धब्बा सा रह जाता है. पूरी रात की स्याही सारे आलम को अपनी नमी से गीला कर देती है,एक अजीब सा सन्नाटा उसमें सांय सांय बजने लगता है. रास्तों पे बिख्ररा कूड़ा और उसके लिए खींचतान करते कुत्ते सड़क की बदहवासी को और बढ़ा देते हैं.मैं खिडकी बंद करके बिस्तर पर आ जाता हूँ

शोर अब बाहर से अंदर आ जाता है. तख़्त पर रखी चादर मेरे हाथों से कई बार छूट जाती है.मेरे बैठते ही तखत कसमसाने लगता है और आवाज के साथ एक बोझ से दब जाता है.तकिया दीवार और तख़्त के बीच की लकीर पर चिपक जाता है. मैं बिना शोर किये तखत के एक कोने में एक सीधी लकीर के जैसा लेट जाता हूँ,कई बार उस लकीर ज़र्क आता है और फिर सीधी हो जाती है. इसी दौरान नींद मेरे सिरहाने बैठ कर मेरे कन्धों ,छाती ,पेट जाँघों और पाँव के अँगूठों के पोरों को सहलाने लगती है और मैं... रात और दिन के किसी फासले पर ढेर हो जाता हूँ   

Sunday, March 24, 2013

बुदबुदाते लोगों के बीच


बुदबुदाते, खामोश और रेंगते लोगों के बीच
जब मैं अपने आप को देखता हूँ तो
मेरे होंठ भी प्रार्थना मैं बुदबुदाने लगते हैं
और रेंगने लगती है घृणा मेरे दिमाग में ,
मैं भी उनकी तरह खामोश हो जाता हूँ
और मर जाता है मेरे अंदर बोलता,
 चिल्लाता चीखता इनसान मर जाता है 

Tuesday, May 22, 2012

???

राह बदल गयी मेरे मुल्क की
हवा बदल गयी मेरे मुल्क की ........
अब लहू रगों में सर्द हो गया
बाजुओ का जोर खत्म हो गया
हर तरफ बाजार का सा शोर है
आदमी का भाव कमजोर है
नींद टूटती नहीं है खल्क की..........
राह बदल गयी मेरे मुल्क की
दिल दिमाग इश्क के बुखार में
देह का जुलुस है जवानियाँ
सुन के भी खून खौलता नहीं
जुल्म की बेंइन्तहा कहानियां
नीयतें खराब शाहे तख्त की ...

Sunday, May 20, 2012

एक लंबी चुप्पी के बाद !

एक लंबी चुप्पी के बाद ...
कितना अच्छा लगता है बोलना
जैसे दोपहर भर उमस के बाद शाम की बारिश ,
या लंबी सर्द रात के बाद गुनगुनी धूप
कभी महसूस करना
किसी के न होने के बाद
 उसके होने का अहसास ......